आज का समाज भौतिक क्षेत्र में विकास कर रहा है। जीवन-क्रम द्रुतगति से बदलता जा रहा है। प्राकृतिक साधनों
का भी अधिकाधिक उपयोग हो रहा है, फिर भी जनसंख्या का संतुलन और उस पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।
अर्थशास्त्र के नियमानुसार, जीवन-स्तर के निम्न होने पर जनसंख्या बढ़ती है। भारत शायद इसी दरिद्रता का
शिकार बना हुआ है। जनसंख्या की वृद्धि की समस्या अन्य अनेक समस्याओं को पैदा करती है। प्रतिवर्ष उत्पादित खाद्यान्
अपर्याप्त हो जाता है और जो है, वह महँगा हो जाता है। इसी हिसाब से अन्य उपयोगी वस्तुओं के दाम भी बढ़ते हैं। सरकार के
पास काम की कमी हो जाती है, अत: बेकारी भी बढ़ती जाती है। वैज्ञानिक प्रगति के कारण पूँजीवादी अथवा साम्राज्यवादी
आधिपत्य मानव-श्रम को दिन-प्रतिदिन उपेक्षित करता जा रहा है। ऐसी स्थिति में जनसंख्या की स्थिरता आज की अनिवार्य
माँग बन गई है।
सुप्रसिद्ध विचारक गार्नर का कहना है कि जनसंख्या किसी भी राज्य के लिए उससे अधिक नहीं होनी चाहिए,
जितना साधन-सम्पन राज्य के पास है। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है- जनसंख्या किसी भी देश के
लिए वरदान होती है, परन्तु जब अधिकतम सीमा-रेखा को पार कर जाती है, तब वही अभिशाप बन जाती है। वर्तमान समय
में जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है। हमारे सामने अभी जनसंख्या-विस्फोट की समस्या है। बढती हुई
जनसंख्या का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की जनसंख्या मात्र ३३ करोड़
थी, जो अब १४६ करोड़ के लगभग हो गई है। विश्व की लगभग १८ प्रतिशत जनसंख्या भारत में निवास करती है, जबकि भू-
भाग की दृष्टि से भारत का क्षेत्रफल विश्व के कुलक्षेत्र फल का मात्र २.५ प्रतिशत है। यह हमारे लिए बेहद चिन्ताजनक है।

कुछ वर्ष पूर्व संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक आबादी पर जो रिपोर्ट प्रकाशित की है, उसमें कहा गया है कि २०२७ तक भारत की
आबादी डेढ़ सौ करोड़ के पार पहुंच जाएगी। अभी भारत की आबादी १४६ करोड़ है। रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया की
आबादी, जो अभी ८.१० अरब है, अगले तीन दशकों यानी २०५० तक बढ़ कर दस अरब से भी ज्यादा हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र
की यह रिपोर्ट बताती है कि २०१० से लेकर २०१९ के बीच भारत की आबादी १.२ फीसद की सालाना दर से बढ़ी है। जबकि
इस दौरान चीन की जनसंख्या वृद्धि दर ०.५ फीसद ही रही। भारत में एक महिला औसतन २.३ बच्चों को जन्म दे रही है।
हालांकि इस जन्म औसत में पिछले पांच दशक में काफी सुधार आया है। १९६९ में यह दर ५.६ थी। यदि वैश्विक स्तर पर
देखा जाए तो यह आंकड़ा अभी ढाई फीसद है। यदि औसत आयु की बात करें तो २०१९ में जीवन प्रत्याशा उनहत्तर साल है
जो १९६९ में मात्र सैंतालीस साल थी। वर्तमान में जापान के लोगों की औसत आयु चौरासी साल है जो दुनिया में सबसे ज्यादा
है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की आधी से ज्यादा जनसंख्या वृद्धि नौ देशों में होगी। इनमें भारत,
नाइजीरिया, पाकिस्तान, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, इथियोपिया, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिदाा और अमेरिका हैं।
अन्य सभी देशों की तुलना में भारत को जनसंख्या वृद्धि की समस्या के भीषण रूप का सामना करना होगा। रिपोर्ट के
अनुसार भारत की आबादी आने वाले कई वर्षों तक बढ़ती रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि बढ़ती आबादी किस तरह से
नई-नई चुनौतियां खड़ी कर रही है। परिवार नियोजन के आधे-अधूरे कार्यक्रमों, अशिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के
अभाव, अंधविश्वास और विकासात्मक असंतुलन के चलते आबादी तेजी से बढ़ी है। निश्चित रूप से अब भारत दुनिया का
सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश हो गया है तो भारत के समक्ष वर्तमान में दिखाई दे रही जनसंख्या की चुनौतियां और
अधिक गंभीर रूप में दिखाई देंगी।
यदि हमें देश को जनसंख्या विस्फोट से बचाना है तो ऐसी योजनाएं बनानी होंगी जो देश के आम लोगों को आर्थिक रूप से
संपन्न बना सकें। साथ ही साक्षरता के लिए भी प्रयास करना होगा, जिससे शिक्षा का प्रकाश सब तक पहुंच सके। परिवार
कल्याण कार्यक्रम में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। ऐसी नीतियां भी बनानी होंगी जिनसे जनता स्वयं इसमें
रुचि ले। एमरजेंसी के दौरान जिस तरह जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए गए थे, वे किसी से छिपे नहीं हैं। उस समय
सरकार के इस प्रयास के विरोध में जनता जबरदस्त गुस्से में थी और इसका खमियाजा सरकार को उठाना पड़ा था। इसलिए
यह स्पष्ट है कि यदि जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों और जनअवधारणों के बीच असंतुलन और संवादहीनता की स्थिति
कायम रहेगी तो बेहतर परिणाम सामने नहीं आएंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पिछले सत्तर वर्षों में सरकार और विभिन्न
सामाजिक संगठन जनता के साथ एक ऐसा संवाद स्थापित करने में नाकाम रहे हैं जिससे कि इस समस्या का स्थायी
समाधान निकल सके। मुख्य चिंता जनसंख्या को स्थिर करना है। निश्चित रूप से भारत में जनसंख्या वृद्धि को रोकना एक
कठिन चुनौती है, लेकिन यह कोई असंभव काम भी नहीं है। यदि देश प्रतिवर्ष की वृद्धि से बचना चाहता है, तो केवल एक
ही मार्ग शेष है कि आवश्यक परिवार नियोजन एवं जनसंख्या हतोत्साहन की कड़वी घूँटी लोगों
को पिलाई जाए। इसके लिए एक उपयुक्त जनसंख्या नीति की भी आवश्यकता है।






