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केंद्र को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

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दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गंगा नदी का जल जगह-जगह सूख रहा है वही पन बिजली परियोजनाओं की बात हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कम हो रही गंगा पर चिंता जताते हुए कहा कि इसका जल अब तो टुकड़ों में बह रही है। यकीनन केंद्र सरकार द्वारा गंगा बेसिन में जल विद्युत परियोजनाओं को शीर्ष अदालत ने मंजूरी देने पर प्रश्न खड़ा किया है। अदालत ने यह साल किय जिसमें आरोप लगाया गया कि बिना पर्यावरण का ध्यान रखे हुए ‘पन बिजली परियोजनाओं’ को मंजूरी दी जा रही है। फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से पीएचडी धारक भरत झुनझुनवाला सहित अन्य लोगों ने आवेदन दर्ज की है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि पहले से ही गंगा किलोमीटर दर किलोमीटर खंडों में बह रही है। इस तरह क्या यहां और पनबिजली परियोजनाओं की दरकार है। पीठ ने अनुसार बहस का मुद्दा पनबिजली परियोजनाओं का गुण-दोष है।

पीठ का मानना है कि इस तरह का मसला सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य पीठ के समक्ष लंबित होता है। हालांकि केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं की ओर से पीठ ने पेश किये गए वकील पीएस शारदा और इस मामले के बारे में सभी स्थिति से अवगत करने के लिए कहा है। 9 फरवरी तक शीर्ष अदालत ने इस सुनवाई टालते हुए दोनों पक्षों को यह बताने के लिए कहा कि दूसरी पीठ के समक्ष चल रहा मामला किस चरण में है।वही दूसरी ओर न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ उत्तराखंड की जल विद्युत परियोजनाओं से संबंधित 24 मामलों पर सुनवाई कर रही है। दाखिल याचिका में भरत झुनझ़नवाला नेमें दावा किया है कि टिहरी गढ़वाल जिले में बन रहे कोतलीबेल पावर प्रोजेक्ट का इनवॉयवन्रमेंट कॉस्ट सलाना लागत 798.7 करोड़ रुपये है जबकि इससे लाभ 155.5 करोड़ रुपये का है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रोजेक्ट गंगा बेसिन पर है। कुछ जगहों पर तो गंगा सूख गई है। दाखिल आवेदन में इस बात पर जोर दिया गया है कि गंगा, यमुना, अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के किनारे में पनबिजली परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले सामाजिक पर्यावरण को ध्यान में रखकर उनका आकलन होना चाहिए।

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